Showing posts with label उर्दू. Show all posts
Showing posts with label उर्दू. Show all posts

Sunday, September 7, 2008

मौत ने चुपके से जाने क्या कहा, ज़िन्दगी ख़ामोश होकर रह गयी.

Death of a great modern poet 'Ahmad Faraz'

उर्दू शायरी के एक युग का अंत

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जाने वाला,

तेरी बख़्शीश, तेरी देहलीज़ पे धर जायेगा।

-अहमद फ़राज़

(January 14, 1934 - August 25, 2008)

एक शेर 'फ़राज़' के नाम -

कह रहा है दरिया से समंदर का सुकूत,

जिसका जितना ज़र्फ़ है उतना वो ख़ामोश है।

( सुकूत-ख़ामोशी, ज़र्फ़-सामर्थ्य, दिमाग़, क़ाबिलियत )

- इक़बाल

Monday, July 7, 2008

गिरती तहज़ीब - 'उर्दू'

ग़ालिब जिसे कहते हैं, उर्दू का ही शायर था

उर्दू पे सितम ढा कर, ग़ालिब पे करम क्यों है.

- साहिर लुधियानवी

Sunday, May 11, 2008

Inspired by a रुबाई of Tagore's Geetanjali - 'एई मॉलिन बॉस्त्रो छाड़ते हॉबे'

ये थकी थकी सी ख़ुदी, ये तार तार लिबास, इसे उतार तो लूँ. रोज़ की गर्द-ओ-तपिश में डूबा हुआ ये बदन, तर-ब-तर पसीने से भीगा हुआ पैराहन.
आफ़ताब डूब चला, अब कार-ए-रोज़गार तमाम,
शब-ए-विसाल का तवील इंतज़ार तमाम।
शाम ढलने लगी, खिलने लगी गुल-ए-शब की फ़स्ल,
धुला बदन, उजला पैराहन, हुई तक्मील तैय्यारी-ए-वस्ल.
और कुछ देर, इन्ही गुलों में सफ़बस्ता हो जाऊंगा,
पसमंज़र-ए- अफलाक़ से वाबस्ता हो जाऊंगा,
ज़रा ठहर, मेरे रफीक़, ज़रा ठहर....
ज़रा ठहर के गुज़श्ता लम्हात को पुकार तो लूँ,
आख़िरी दम अपने नग़्मात को संवार तो लूँ,
और अब वक्त कहाँ नग़्मा सराई का,
ये थकी थकी सी ख़ुदी, ये तार तार लिबास,
इसे उतार तो लूँ.

- हर्ष

January of 1993

Please don't waste your time here if you don't understand Urdu.,